मुनिश्री की दृष्टि में धर्म कोई रूढ़िवादी परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को सहजता और शुचिता से जीने की एक कला है। इसी व्यावहारिक अध्यात्म को धरातल पर लाने का भगीरथ संकल्प उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य रहा है। उनका गांभीर्य, सांसारिक इच्छाओं से रहित निस्पृह चर्या और वात्सल्य से भीगी मंद मुस्कान हर उस अशांत हृदय को संबल देती है, जो सांसारिक चक्रव्यूह में उलझकर शांति की तलाश कर रहा है।
युगसाधक संतशिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के सुयोग्य शिष्य
वर्ष 2000 में बीना जी की पवित्र धरा पर वे 'प्रभात मंडल' से जुड़े और गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार धर्म की प्रभावना तथा विभिन्न धार्मिक आयोजनों को सुचारू रूप से संपन्न कराने में अपना श्रेष्ठतम योगदान देने लगे।
इस महान तपस्वी की जीवन यात्रा का प्रारंभ महाराष्ट्र के चैतन्यमयी महानगर नागपुर की पावन धरा पर हुआ। वहां के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और संस्कारी जैन परिवार (सेठी-नायक परिवार) में श्री शिखरचंदजी जैन और धर्मपरायणता की प्रतिमूर्ति श्रीमती सुषमादेवी जैन के घर 31 मई 1973 को एक अलौकिक बालक का जन्म हुआ। माता-पिता ने अपने इस प्रथम पुत्ररत्न का नाम शैलेश रखा जिन्हें घर में सभी स्नेह से रिंकू कहकर पुकारते थे। आगे चलकर इस परिवार को तीन और पुत्ररत्नों की प्राप्ति हुई — श्री नीलेश जैन, श्री रूपेश जैन और श्री धर्मेश जैन।
शिक्षा एवं प्रारंभिक जीवन
बालक शैलेश का बचपन सांसारिक आकर्षणों से परे एक अलग ही आभा से युक्त था। वे अपनी कुशाग्र बुद्धि और विलक्षण एकाग्रता के कारण विद्यालय के दिनों से ही सदैव अग्रिम पंक्ति में रहे। वर्ष 1988 में दसवीं और 1990 में बारहवीं की परीक्षा उच्चतम अंकों के साथ उत्तीर्ण की। इसके बाद वर्ष 1994 में बी.टेक. (केमिकल इंजीनियरिंग) की उपाधि प्राप्त की, तथा एम.बी.ए. (फाइनेंस), सी.एफ.ए. (तीसरा लेवल) एवं पी.जी.डी.सी.ए. भी पूर्ण किया।
वैराग्य की ओर प्रथम कदम
संसार की इस तीव्र चकाचौंध के बीच भी शैलेश जी का अंतस शाश्वत आनंद की खोज में निरंतर व्याकुल रहता था। संतशिरोमणि आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रथम दर्शन ने उनके भीतर सदियों से संचित वैराग्य के बीज प्रस्फुटित कर दिए। जुलाई 1993 में रामटेक की पावन भूमि पर आचार्यश्री के चरणों में तीन वर्ष के लिए ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया, और 31 जुलाई 1996 को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर महुआजी (सूरत) में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत की दीक्षा ग्रहण की। वे अब ब्र. श्री शैलेश जी नायक के रूप में गुरु संघ में समाहित हो गए।
बिना किसी पूर्व पद के सीधे मुनि दीक्षा — जैन श्रमण परंपरा में अत्यंत विरल और ऐतिहासिक निर्णय
ब्र. शैलेश जी की अनवरत तपस्या और गहन दार्शनिक परिपक्वता को देखकर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने उन्हें क्षुल्लक अथवा ऐलक जैसी मध्यवर्ती अवस्थाओं के बिना ही सीधे पूर्ण दिगंबर मुनि पद प्रदान करने का निर्णय लिया। 21 अगस्त 2004 को मध्य प्रदेश के जबलपुर में नर्मदा तट पर स्थित दयोदय तीर्थ, तिलवारा घाट में आचार्यश्री ने उन्हें सीधे दिगंबरत्व की दीक्षा प्रदान की — और बा.ब्र. शैलेश जी से वे मुनि श्री 108 वीरसागर जी महाराज बन गए।
लौकिक जगत में प्रायः यह माना जाता है कि वैराग्य की उत्पत्ति संसार की अकर्मण्यता या किसी विफलता के कारण होती है, परंतु मुनिश्री का पूर्वावस्था काल इस धारणा को सिरे से खारिज कर देता है। संयम पथ पर कदम रखने से पूर्व उन्होंने कॉर्पोरेट जगत का वह शिखर स्पर्श किया था, जिसकी कामना हर पढ़ा-लिखा युवा करता है।
वर्ष 1994 में गुजरात के पोरबंदर में 'बिरला वी. एक्स. एल. लि.' में इंजीनियर, 1995 में दिल्ली में एक बड़ी ऑयल कंपनी में जिम्मेदारी, और 1995-1999 के मध्य मुंबई में फॉरेक्स व कमोडिटी मार्केट में कार्य — इस दौरान उन्होंने 'एस.एस. एडवाइजर सर्विस कंपनी' में पार्टनर बनकर अपना स्वयं का व्यवसाय भी स्थापित किया।
जब वे धन, संपदा और भौतिक सुखों के चरम पर थे, मायानगरी की माया भी उन्हें मोहित न कर सकी।
मुनिश्री केवल जैन सिद्धांतों के ज्ञाता ही नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान की गहरी परतों को समझने वाले एक कुशल पारखी भी हैं। आज का युवा जिन मानसिक द्वंद्वों, करियर के तनावों और एकाकीपन से जूझ रहा है, मुनिश्री उन्हें अपनी अनुभवसिद्ध वाणी से पल भर में सुलझा देते हैं — कोई उपदेश नहीं, बल्कि युवाओं के ही तर्कों और विज्ञान की भाषा में समाधान।
व्यावहारिक दृष्टिकोण
मुनिश्री का दृढ़ विश्वास है कि धर्म कोई जड़ क्रियाकांड नहीं, बल्कि दैनिक आचरण में जीने योग्य पवित्र तत्व है। पूज्य गुरुदेव आचार्य विद्यासागर जी महाराज के 'प्रैक्टिकल धर्म' को गति देते हुए मुनिश्री देश भर में युवाओं के लिए विशेष वर्कशॉप्स आयोजित करते हैं, जो करियर तनाव, पारिवारिक दायित्व और मानसिक शांति के बीच संतुलन सिखाती हैं।
"सुख अगर चाहिए तो उसे अपने भीतर ही खोजना होगा, क्योंकि जो भी हमें बाहर से मिलेगा, वह पराश्रित होने के कारण अंततः हमें दुखी ही करेगा।"
साहित्य एवं विद्या ग्रेस फाउंडेशन
मुनिश्री की अमूल्य वाणी को भक्तों ने 'भक्ति रहस्य', 'क्वेस्ट फॉर हैप्पीनेस' और 'सुख की खोज' जैसी पुस्तकों में पिरोया है। वर्तमान वर्ष 2026 का वर्षायोग बेंगलुरु में आयोजित होने जा रहा है। मुनिश्री की प्रेरणा से 'विद्या ग्रेस फाउंडेशन' निर्धन बच्चों की शिक्षा, युवा कौशल-विकास, जीव दया और सुलभ चिकित्सा जैसे परमार्थिक कार्यों में निरंतर संलग्न है।
परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री वीरसागर जी महाराज ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने पावन चातुर्मास के माध्यम से धर्म की पावन गंगा प्रवाहित की है — विदिशा, नीमच, अर्थूना, हांसी, नई दिल्ली, सहारनपुर, सरधना, आगरा, शाहपुरा, पुणे, नेमावर एवं कुंथलगिरी सिद्ध क्षेत्र होते हुए अब 2026 का वर्षायोग बेंगलुरु में।
तजकर जगत की संपदा, धारण किया मुनि-वेश॥
विद्यागुरु के शीश का, जो बन गए हैं सुंदर ताज।
कोटिश: नमन वीरसिंधु को, धन्य हैं ऐसे महामुनिराज।